"A bi-lingual platform to express free ideas, thoughts and opinions generated from an alert and thoughtful mind."

Wednesday, June 30, 2010

The Slow And Silent Death- A 55 Words Fiction!

It was his eighth day at the hospital. Silently, he opened his eyes for a few minutes. His mom enquired, “Do you need something?” He looked towards her and closed his tired eyelids.

Suddenly, his shouts can be heard aloud.

Moments after, his face looked pale and body seemed released. The doctors announced the death!

तीन त्रिवेणी-8

1. बिलखती नदी है
बिछड़े किनारे

तू छोड़ गया हमें किसके सहारे?

2. सब बदल सा गया है
शायद आगे बढ़ गया है

आज फिर, मन वही रुक गया है!

3. कुछ तारीखे क्यूँ मिटती नहीं
दस्तक दे थपथपा जाती है

काश जीवन कैलेंडर में ना बंद होता!

Monday, June 28, 2010

Honor Killing: The Killing of My Honor!

This is an English translation of my Hindi poem “ऑनर किलिंग: मेरे सम्मान का खून!”

I am the seed
It’s me, who is bearing, the responsibility to carry life
Beyond the passage of time
I am the one, taking care of eternity!

Whose life?
Humans who attacked me
For their phoney social image and respect
They awarded me death that death itself fears!

As a mother, I didn’t teach them this
As a sister, I didn’t tell them this
As a wife, I didn’t make them understand this
As a daughter, I didn’t ask them this

Then why?
Again and again, these vultures ate me up
Is my life not mine?
Why my dreams remain unfulfilled all the time?

I feel my throat choked up today
I feel burned with scars of constant humiliation today
I feel suffering and caged today
I am losing my breath today

To nurture the vessel
Of my family’s honor inside me
I gave up all my dreams, hopes and happiness
And it kills me every moment like a double headed serpent.

Whom should I trust?
Whom shall I call mine?
Coz’ my own have disgraced me
And took the very essence of my existence!

Forget Savitri! Stays no more Sita here!
Is this the development of humanity?
Hopes and smiles shattered
I will leave my lifeless body behind!

ऑनर किलिंग: मेरे सम्मान का खून!

मैं एक बीज हूँ!
मुझ पर ही हरियाली की ज़िम्मेदारी है
युग-युगांतर तक
मैं ही जीवन चला रही हूँ!

जीवन किसका?
उनका, जो मुझ पर ही वार करते है
अपनी झूठी शान और इज्ज़त के खातिर
मानवता के परे, मौत मुझे देते है!

मैंने माँ बन कर यह तो नहीं सिखाया
मैंने बहन बन कर यह तो नहीं बतलाया
मैंने पत्नी बन कर यह तो नहीं समझाया
मैंने बेटी बन कर यह तो नहीं जताया

आखिर क्यूँ?
बार-बार, यह भेडिये मुझे ही नोचे
क्या मेरा जीवन, मेरा अपना नहीं?
भला, मेरे सपने ही अधूरे क्यूँ?

घुट रही हूँ आज
जल रही हूँ आज
छटपटा रही हूँ आज
साँसे खो रही हूँ आज,

अपने अन्दर पल रहे
परिवार की इज्ज़त के घड़े को भर रही हूँ
जो मेरे सपने, उम्मीदे, और खुशीयाँ
को दो मुहँ वाले साँप की भाँति हर पल निगले जा रहा है!

किस पर करू भरोसा
किस से कहूँ अपनी बात
मेरे अपनों ने मुझे लुटा
मेरा अस्तित्व कर दिया झूठा

खो गई सावित्री, ना दिखेगी कोई सीता
क्या यही है? मानवता का विकास?
बुझ गयी सारी आस
छोड़ जाऊँगी अपनी कोरी लाश!

What Men Want?

Warning: Do not swallow the poem, you may need to see a doctor:-)

World of men should be challenging
Has to be competitive where they move with a lightening speed
And their pockets should be filled with dollars
To get a good-looking and stylish female companion!

Men desire to be independent like a free bird
Enjoy endless choices around
Nevertheless, it brings them prestige & instant fame!

Warn it, they need humor to amuse their senses
And, this is their formula of success in life
Nice and appreciative words they love to hear
That’s all, men want!

Saturday, June 26, 2010

What Women Want?

This is in response to 'What Women Want', by blogadda with pringoo

W omen search for respect
H umor & humility denoting high taste
A nd a defined space of their own
T hey yearn for fair challenges.

W here they show dedication & commitment
O pportunities to strengthen their existence
M oney to buy everything they desire for,
E qual rights with their counterparts
N ights and days of endless love and romance

W ords of appreciation and gratitude
A great family to support
N umber of trustworthy friends to share laughter
T hat’s all, women want!

बूँदें घिर आई है!

मौसम ने करवट ली है
तपती ऊष्मा की जगह,
मीठी बूंदों ने ली है!

बिजली की तलवार का वार
चाहे हर मन बार-बार
बरसती फुहारों की मार
बरसे है द्वार-द्वार!

पंछियो का कलरव
धरती का यौवन
बूंदों का रस
दृश्य सम्मोहक

झम-झम करके बरसो आज
चऊ दिशा में बजे नाद
मन से मन का हो संवाद
है हर मन ही यही फ़रियाद!

Thursday, June 24, 2010

My Version of Our Friendship!

The poem is dedicated to my best friend, Rahamath! Thank you for being my friend!

Alone and depressed, I looked all around to plant a seed,
Nurtured it with my wild mind’s imaginations and thoughts,
Cultivated many thoughts with wings;
Alas! No one heard my heart out.

Woke up, one day I got a magic apple,
I opened my computer and found you – a great sample.
Initially, your words irritated me
Gradually, your thoughts infuriated me.
But, somewhere you made an impression
Deep, positive and aeonian – oh no I fell into depression!

Together, we shared so many laughter and narrations,
Unseen, unheard, witty, spicy and viewpoint volutions
Be always as I say here; paint my unparalleled imaginations
With the shades of clarity, sincerity, and trust that last forever!

Tuesday, June 22, 2010

तीन त्रिवेणी-7

A Tribute to Ray Gorringe, a man of powerful and meaningful words!
You are with us and we will never forget you.

1. शब्द सिसक उठे
भावनाये रो पड़ी
कलम पर उसके हाथों की गर्मी अभी बाक़ी है!

2. शब्द मिटते नहीं
भले ही आवाज़े खो जाए
अंधरे रास्ते में एक दीया जला छोड़ दो!

3. मौन ना रहो
गुमसुम ना बनो
जाने वाला शब्दों का व्यापारी था!

Teen Triveni-7

1. Shabd sisak uthe
Bhavnaaye ro padi

Kalam par uske haathon ki garmi abhi baqi hai!

2. Shabd mitte nahi
Bhale hi awaze kho jaaye

Andhare raaste mein ek diya jala chhod do!

3. Maun na raho
Ghumshum na bano

Jaane wala sabdo ka vyapaari tha!

Saturday, June 19, 2010


1. संजोये सपने
लगते है अपने
आँख खुले
धुंधला जाए सपने!

2. सपनो का संसार कितना भाता है
पल भर में सरहद पार पहुँचा आता है
ना कोई टिकट, ना कोई पूछ-ताछ
पँख लगा दुनिया घुमाता है!

3. मेरे सपनो के रंग खो रहे है
शायद, काजल की कोर के साथ बह निकले
कल तक तो आँखों में तैर रहे थे
आज आस-पास, कही बिखरे पड़े हो!

4. सपनो का गट्ठर कितना भारी है
मेरी सारी ज़िन्दगी इसको उठाने में ही निकल जायेगी!

5. सुना है, सपने पूरे नहीं होते
बुलबुले के जैसे, आकार ले कर फूट जाते है
मैंने, अपने सपनो को हथेली में उठा रखा है
इस बार, न फूटने दूँगी!

Friday, June 18, 2010


1. भावो के अनोखे रंग
कर दे मुझे दंग
जाए सब संग-संग
दृश्य बड़ा विहंग!

2. रंगों की शीशीया मैंने
पानी में उलट डाली
कुछ यूँ मिल गए सब
पहचानो, कौन से तुम्हारे रंग है?

3. रंग ही जीवन है
या जीवन के रंग है
हर पल, कुछ नया आकार उभर कर आता है!

4. लो, पकड़ लो!
रंगों के धागे
बाँध लो मुझसे इनको
हम दोनों लाल-पीले हो गए!

5. रंग किसके है?
मेरे या तुम्हारे?
एक उजली या काली लकीर खीच दो
सारा फर्क मिट जायेगा!

Wednesday, June 16, 2010

The Call!

Looking into my eyes, he promised to make a call. With tears in my eyes, I believed his words. Nights went by and morning sunny bright, neither he came nor his call.

Suddenly, the phone rang. My heart skipped a beat. "I am sorry for delaying the call." He said apologetically.

I smiled with a heavy heart.

The Remembrance!

As soon as,I entered into my old room, a sense of belonging overcame my mind. Greedily, I started looking into everything.

"Where it could be?" I murmured.

Something struck me and I looked under the bed grabbed a small box. Happily, I opened the lid, my mother's fragrance spread all over the room!

तीन त्रिवेणी-6!

1. औकात की बात करते हो
सर ऊचा उठा कर चलते हो

एक मिटटी की मूरत से फिर भी डरते हो?

2. कितनो की जाने ली है, तुमने
कितनो के घर उजाड़े है!

बोल, अब तू किसके सहारे है?

3. अँधा कुआ है
लंगडाती परछाईया

मौन की सिसकी दिल दहलाने वाली है!

Monday, June 14, 2010

स्वयं की खोज – एक अदभुत यात्रा!

एक अनोखी अंतहीन यात्रा
ना कहो इसे बिंदू या मात्रा!

समय के चक्रव्यूह से परे
निर्विकार, निर्मल और स्फूर्ति भरे
उस ‘स्वयं’ को खोजने चले!

जो देख के भी ना दिखे
जो समझ से भी जटिल रहे!
जो ज्ञात हो के भी अज्ञात लगे!

यह विशालकाए समुन्द्र
में उस कुचली हुई छोटी सी बूँद
के अस्तित्व के समान है
जो, ओझल और तिरस्कृत होते हुए भी
अपने होने का आभास कराती है!

कोई कहे, ज्ञान से इसको पा लो
कोई बिरला चाहे, ध्यान से इसमें समा लो
कोई इसे कर्म में ढूंढे,
स्वयं फिर भी अपरिचित लगे!

स्वयं का यही सार
जीवन के है दिन चार
खुशिया लुटाओ खुले हाथ
लिए संग अपनों को साथ
भावनाओ को जीओ भरपूर
ना रहो, स्वयं से दूर
भीग जाओ मधुर क्षणों के रस में
अनुभव करो स्वतंत्रता हसी में
सपनो पर रखो पूरा विश्वास
छोड़ना नहीं कभी तुम आस
यही है, तुम्हारे होने का प्रयास
सच्चा, स्वयं का आभास!


बागीचे में लगी क्यारियों
में खिले मासूम फूलों
जैसी है बहनें!

पा कर अस्तित्व मिटटी का
बाबुल के घर में
बंदनवार बन सजी है, बहनें!

ये, पिता की थकी आँखों
का सुकून है!
ये माँ की फीकी मुस्कान
का नूर है!
ये भाई की भुजाओ का
उबलता खून है!

बादलो में चमकते
इन्द्रधनुष के रंगों
जैसी फबती है, बहनें!

मंदिर की घंटी की तान, बहनें
परिवार का विस्तार है, बहनें!

Friday, June 11, 2010

तीन त्रिवेणी-5!

1. उसकी देह रूपी ईमारत
एक झटके में ही ढह गई!

यादों के कंकर अब भी मेरे पाँव में देर तक चुभते है!

2. मन करता है
आज छुप जाऊ उस अँधेरी कोठारी में

जहाँ पर मन को झिंझोर कर वापिस लाना आसन होता है!

3. नदिया सूख गयी
नहरे उजड़ गयी!

हाँ, मैंने भी अब बाँध बनाना सीख लिया है!


हाँ, मैंने की है!
तुम भी कर के देखो
बड़े-बड़ो ने की है
कभी तो मिलेगी
सफलता, क्यूंकि
सुना है, कोशिशे कभी बेकार नहीं जाती!

Wednesday, June 9, 2010

बुलबुलों की कहानी!

कुछ क्षणों की कहानी है
बुलबुलों की जवानी!

सुकोमल जीवन
लगती बेईमानी है, बुलबुलों की जवानी!

पल भर की ख़ुशी
मिट जाना इसकी निशानी है, बुलबुलों की जवानी!

पास बुलाये
आह! बड़ी नीरस कहानी है, बुलबुलों की जवानी!

Bulbule ki kahani!

Kuch kshano ki kahani hai
Bulbulo ki jawani!

Sukomal jeevan
Lagti beimani hai, bulbulo ki jawani!

Pal bhar ki khushi
Mit jana iski nishaani hai, bulbulo ki jawani!

Paas bulaye
Aah! kya kahani hai, bulbulo ki jawani!

अभी मिली ख़ुशी!

बचपन के मासूम दिनों में छुपाये
दस के एक नए नोट
का मिलना
कुछ यूँ लगा
जैसे, दूर उस चमकते तारे
का किनारे का टुकड़ा मिल गया हो
और मेरे हाथ उसकी चांदनी में भीग गए हो!

Abhi mili khushi!

Bachpan ke masoom dino mein chhupaye
Das ke ek naye note
Ka milna
Kuch Yun laga
Jaise, dur us chamakte taare
Ka kinare ka tukda mil gaya ho
Aur mere haath uski chandni mein bhig gaye ho!

आप, तुम, और मैं!


आपका एहसास, आपके नहीं होने से ज्यादा अर्थपूर्ण है
क्षण भर की अनुभूति
खिला देती है फूल बहार के
जगमगा देती है, ज्योति नैन द्वार की!


कौन हो तुम?
क्या वही जो बिन कहे चले गए थे?
क्या वही जो बिन बुलाये आये हो?
क्या वही जो आँखों के सामने भी ओझल खड़े हो?
तुम, वही हो ना!


आईने में देखती हू जिसे
पहचाना सा लगता है
पल में क्यूँ ना जाने यह मीलो की सैर करता है
आप और तुम की याद में ही धसा रहता है!

Sunday, June 6, 2010

पर्यावरण बचाओ!

जागती आँखों से सोने वालों
मिथ्या जीवन को भोगने वालों!
मुड के अपने आधार को सोच ज़रा
आवाज़ लगा, पर्यावरण बेसुध है कहाँ पड़ा?
जो आज, सिसक-सिसक दम तोड़ रहा
तू फिर भी क्यूँ मौन रहा?

याद नहीं!
तेरे जन्म पर हवाएँ रागीनिया गाई थी
दिशायें ख़ुशी से झूम उठी थी
मोरनी नाच के मन हरषाई थी
हरियाली, सबके मन में उतर आई थी!

फिर बाबा ने कहा था,
लगता है मानो, सृष्टी तुझे दुलारती है
अपने आप में समाती है!

प्रकृति अपना बंधन निभाती रही
तुझे कभी ना जताती गयी
हाँ, खुद खाली होती गयी!
तू कैसे अपना कर्त्तव्य भूल गया?
अपने अस्तित्व के रज-कण से ही दूर होता गया!

प्रकृति और जीव इस जीवन के मूल आधार
जो ना बढाया अभी हाथ,
छुट जायेगा साथ
इसलिए, पर्यावरण बचाओ
जीवन को लौटाओ!

Friday, June 4, 2010

तीन त्रिवेणी-4

1. सूरज से मेरे जीवन को
मौत का गहरा अँधेरा एक पल में निगल गया

मौन खड़ी, मैं देखती रह गयी!

2. जैसे-जैसे मोमबत्ती पिघलती गयी
वैसे-वैसे मन मेरा भरता गया

खालीपन क्यूँ और भी गहराता गया?

3. अँजुरी भरी बारिश ने
सरोबार कर दिया

पता नहीं, भीगने का मन था या आंसूओ में बड़ा दम था!

Thursday, June 3, 2010

जीवन एक यात्रा!

मेरा जीवन एक यात्रा है
जिसमे कर्म बने है राहें
मेरी सोच मुझे गाईड बन रास्ता दिखाती है
मेरा आत्मविश्वास मेरा सामान है
आँसू, दुःख, तकलीफे, राह के पत्थर बन उभर आते है
और अपना निशान छोड़ जाते है
शब्दों के गागर से जब लय बंद लडिया फूट पड़ती है
तब गीत मेरे हम सफ़र बन जाया करते है!

मेरी यात्रा अंतहीन है
जब भी कभी, मन कही रुकने को होता है
मेरी मन की उड़ान नयी राहें खोज लेती है
और फिर मैं, चल पड़ती हू
नए आयाम ढूंढने के लिए
उसको जी लेने के लिए!

Jeevan ek yatra!

Mera jeevan ek yatra hai
Jisme karm bane hai raahein
Meri soch mujhe guide ban raasta dikhati hai
Mera aatma vishwas mera saaman hai
Aanso, dukh, taklife, raah ke pattar ban ubar aate hai
Aur apna nishan chod jaate hai
Sabdo ke gaagar se jab lay band ladiyaa fut padti hai
Tab geet mere ham safar ban jaaya karte hai

Meri yatra antheen hai
Jab bhi kabhi, man kahi rukne ko hota hai
Meri mahatvakanshaaye nayi raahein khoj leti hai
Aur fir main, chal padti hu
Naye aayam dhundhne ke liye
Usko jee lene ke liye!