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Monday, September 26, 2011

हम-1


हम मिले
साथ चले
चलते रहे
दूर तक
मीलों पार
खोने लगे
रास्ते अपने
मुड़ के देखा
सुकून था

रास्ता जाना पहचाना था
यह वही जा रहा था
जहाँ हमें जाना था!

हम


याद नहीं

कब
कैसे
कहाँ

मैं और तुम
बन गए हम

कहते रहे
सुनते गए
सोचे बिना
चलते रहे
जुड़ते चले
फलते बढे

लगता है ऐसे ही
उलझ गए मैं और तुम

Monday, September 12, 2011

बातें


खट्टी-मीठी
तीखी-रसीली
भूली-बिसरी
नयी-पुरानी
मनभावन-मतवाली
गुदगुदाती- टीस जगाती
कभी हसांती-कभी रुलाती

बातें ख़तम कहाँ होती है
एक पल में
मीलों पार पहुच जाती है
पुराना-नया सब सामने आ जाता है!

Monday, September 5, 2011

ऊँचाई


समझ नहीं आता ऊँचाई का चक्कर
आखिर मिलना यही है मिटटी में जा कर
जन्म से ही सब ऊँचाई को तरसे

ऊँचाई
कितना लुभाती है
बाद में बहुत सताती है

कितनी ऊँचाई ?
जहाँ तुम दूसरों को देख ना सको
जहाँ तुम खुद को पहचान ना सको
जहाँ तुम छोटी-छोटी खुशियों को तरसो
जहाँ तुम संतुष्ठी को तुम खोजो

मुझे नहीं ऊंचा उठना उतना
जहाँ टूटने लगे संजोया सपना
छूटने लगे हर अपना
ऐसी ऊँचाई व्यर्थ है ना?


Saturday, September 3, 2011

मेरी अनुभूति


वही दिन है
वही समय है
शायद वही घडी है

ना वही तुम हो
ना वही मैं हूँ
अनुभूति बदल रही है
मेरे सोचने का अंदाज़
तुम्हारे होने का आभास

इस अनोखी जीवन लीला ने
सैकड़ो मोड़ बदल दिए
कुछ नई राहें रास्ते खोल दिए
शायद यही सही शुरुआत है
एक नए जीवन की!


Tuesday, July 26, 2011

भरा घढा













मैं समुंदर हूँ 
अपने भीतर भरे घढ़े
में भावनाए रूपी मोती 
सहेजती हूँ , सँवारती हूँ
पालती हूँ,  मथती हूँ
कुछ तो उपर झलकने लगते है 
कुछ सतह पर ही 
उलझते रहते है
घढा हमेशा भरा रहता है
जीवन आगे बढ़ता जाता है!

Friday, June 11, 2010

तीन त्रिवेणी-5!




1. उसकी देह रूपी ईमारत
एक झटके में ही ढह गई!

यादों के कंकर अब भी मेरे पाँव में देर तक चुभते है!

2. मन करता है
आज छुप जाऊ उस अँधेरी कोठारी में

जहाँ पर मन को झिंझोर कर वापिस लाना आसन होता है!

3. नदिया सूख गयी
नहरे उजड़ गयी!

हाँ, मैंने भी अब बाँध बनाना सीख लिया है!