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Friday, March 5, 2010

जल होता विलोप , रोको!



जल ही जीवन
खिलाये सुमन
भरमाये पवन
लुप्त हो रहा चमन!

आँखों में बसा
सरकारी फाइल्स में घुटा
बाहर दुनिया दो बूँद को तरसे
प्रसाशन क्यूँ बैठा आँखें मूंदें!

हम और तुम ही
ज़िम्मेदार इसके
आवाज़ जो ना उठाई आज
बस आँखों से ही मिलता रहेगा इसका स्वाद!


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1 comments:

Guy said...

Very thoughtful and creative expression. Keep it up.

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