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Saturday, February 20, 2010

Man Khone Laga Hai! (मन खोने लगा है!)



भावना व्यक्त करना
कितना कठिन होने लगा है!
विचारो को बोल देना
भी जटिल होने लगा है!
उधेड़बुन गहरी
अभिव्यति सिमटी चली जाती है!
शब्द गलत पड़ने से
मतलब बदलने लगते है!

रोको, मेरे मन
इस तूफानी बयार को
उजड़ते संसार को
छुटते हाथों को
अपने आप को!



Man Khone Laga Hai!

Bhavana vyat karna
Kitna kathin hone laga hai!
vicharo ko bol dena
bhi jatil hone laga hai!
Udedhbandh gehri
Abhivyati simati chali jati hai!
Shabad galat padne se
Matlab badalne lagte hai!

Roko, mere man
Is toofani byar ko
Ujadate sansar ko
Chutate haathon ko
Apne aap ko!

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3 comments:

Himanshu said...

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता!!!

Himanshu said...

Your poem is good.. its true that विचारो को बोल देना
भी जटिल होने लगा है!

sanjeevgautam said...

मन का तम ,अँधियारा जग का ..//
मन तुम रचते हो ...//
प्रियतम जीवन का ,रिपु सारे ...//
मन तुम रचते हो ...//
मिलन की मस्ती ,विरह का दुःख ..//
मन तुम रचते हो ..//
अच्छा -बुरा भेद जगत का ..//
मन तुम रचते हो ..//
मोह का तम जिस दीपक हटता ...//
मन वो भी तुम रचते हो ..//
मन इतना कैसे करते हो..//
मन इतना कैसे करते हो..//
(संजीव गौतम )

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