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Monday, September 5, 2011

ऊँचाई


समझ नहीं आता ऊँचाई का चक्कर
आखिर मिलना यही है मिटटी में जा कर
जन्म से ही सब ऊँचाई को तरसे

ऊँचाई
कितना लुभाती है
बाद में बहुत सताती है

कितनी ऊँचाई ?
जहाँ तुम दूसरों को देख ना सको
जहाँ तुम खुद को पहचान ना सको
जहाँ तुम छोटी-छोटी खुशियों को तरसो
जहाँ तुम संतुष्ठी को तुम खोजो

मुझे नहीं ऊंचा उठना उतना
जहाँ टूटने लगे संजोया सपना
छूटने लगे हर अपना
ऐसी ऊँचाई व्यर्थ है ना?


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2 comments:

sanjeevgautam said...

ये राज पुराना है ..यूँ ही आना जाना है ...//
***************************
दुनियाँ में आकर ,स्वप्न सजा कर ... //
हँसी , ख़ुशी और राग रंग कर.. ..//
मिलन विदाई और रंज कर ....//
कभी यहाँ पर ..//
कभी यहाँ से यूँ ही आना जाना है ...//
ये कैसा ताना बाना है .//
***********************
भरम में रहकर ,भरम मे रखकर ..//
नफरत धोखi करम मे रखकर . ..//
माटी की गठरी माटी होकर ..//
माटी मे मिल जाना है ..//
बस यादों में रह जाना है ../
**********************.
कभी यहाँ पर ..//
कभी यहाँ से यूँ ही आना जाना है ...//
ये कैसा ताना बाना है .//
यूँ ही आना जाना है ..//
(संजीव गौतम )

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत अंदाज़ में पेश की गई है पोस्ट......

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