"A bi-lingual platform to express free ideas, thoughts and opinions generated from an alert and thoughtful mind."

Thursday, October 20, 2011

पल आते जाते


सोचा था अपनी मर्ज़ी से जीयेंगे
जो मन आया करेंगे

हवा के पारो पर चढ़ उड़ेंगे
तितली संग फिरते रहेंगे
बारिश की बूदें जैसे
निर्मल कहते रहेंगे
सूरज की नर्म धूप में
बस लेटे रहेंगे!

ना कोई बंधन होगा
ना कोई आवाज़ देगा
उन्मुक्त गगन में
बस उड़ते चलेंगे

सोचा कहाँ होता है
सारा जहाँ अपना कहाँ होता है
थोड़ी सी धूप अपनी
थोडा सा बादल अपना
जो पल मिला अपना लिया
जो छूट गया वो भरमा गया

Related Posts :



2 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

थोड़ी सी धूप अपनी
थोडा सा बादल अपना
जो पल मिला अपना लिया
जो छूट गया वो भरमा गया

इतना भी मिल जाये तो बहुत है ...अच्छी प्रस्तुति

Ashish Joshi said...

very good one ...

Post a Comment