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Wednesday, August 31, 2011

मैं हूँ


अंतरविरोधो से बुने घेरे में
मकड़ी के जाल की भाति उलझी हूँ
हाँ और ना की
दुर्गम प्रशनावली में
सिसकियाँ लेती हूँ

पर मैं हूँ
आगे बढती
मरती जीती
हर कहीं!


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5 comments:

Saru Singhal said...

Heart touching words...

ana said...

wah!!!!

Neeraj Kumar said...

nice one!

Nidhi said...

Beautiful.

sanjeevgautam said...

भीतर का पथिक उलझन में ..

बड़ी धूल है
गुबार है गर्द का
ढँक रहा है सबकुछ
निगल रहा है ..

जैसे गुस्सा निगलता है सबकुछ
एक झटके में तोड़ देना चाहता है ...
स्वप्न सारे
सारी संभावनाओं को ध्वस्त करता ...

लाख चौरासी के फेरों से जगी हर उम्मीद को
खत्म करता ...

ये धूल ये अंधड़ रोक रहे है
अंतर में छुपे अनंत की खोज पर निकलते पथिक के क़दमों को ..

हर उस द्वार को जो खुद से पार जाने का इशारा है
उसे ढँक दिया है इस गर्द ने अपने स्याह लिहाफ से ...
जाने क्यों ? जाने कब तक के लिए ?

गौतम
०७/०९/२०१०
१२:००

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