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Tuesday, June 28, 2011

मरते रिश्ते


कुछ रिश्ते
पैदा होने से पहले
निर्धारित कर दिए जाते है

आँखें खोलते ही
हम उन ही रिश्तो का
हुकुम बजाने लगते है

वही रिश्ते
समय के साथ-साथ
हमें सताने लगते है
बोझिल बने, कंधे झुकाने लगते है
फिर भी, तोड़े नही जाते
बस घिसटते जाते है
घाव गहराते जाते है

उसी मन में
जो कभी हरा भरा था!

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5 comments:

कुश्वंश said...

रिश्ते मरते नहीं मार दिए जाते है या मरने को छोड़ दिए जाते है रिश्ते तो रिश्ते है निबाहने ही होते है , अच्छी रचना बधाई

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

उसी मन में
जो कभी हरा भरा था!

विचारणीय प्रस्तुति .. हर रिश्ता एक समझौता चाहता है तभी निभ पाता है

Azad Alam said...

Beautiful! Your poems always have strong emotions. loved this one too.

Himanshu said...

Beautiful..

"Ghairo Se Poochti Hai Tareeqa Nijaat Ka
Apno Ki Saazisho Se Paraishaan..! Zindagi.."

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