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Saturday, January 29, 2011

एक अलग दुनिया है!




भूल गई थी
तुम्हारी भी एक दुनिया है!

तुम्हारा सूनापन
मेरा अकेलापन

तुम्हारे सूखे होठ
मेरी खिलखिलाती हँसी

तुम्हारे ठहराव
मेरे अन्तरंग भाव

तुम्हारे घाव की टीस
मैं बैठी थी आँखें मीच

जब हम मिले
फूल बहारो में खिले
मिट गए थे सभी फासले
पर भूल गई थी की
तुम्हारी भी एक दुनिया है!

तुम्हारी सीमाएं
तुम्हारी परिस्तिथियाँ
तुम्हारी ऊचाइयाँ
तुम्हारी गहराइया
तुम्हारी सच्चाईया
तुम्हारे नकाब
मुझसे तो अलग है ना!

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10 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना है।
टंकण की अशुद्धियां दूर कर लें।
हसी, बैठी की , थी की, तुम्हारे परिस्थियां, तुम्हरे सच्चाई,

Kunwar Kusumesh said...

भावनाओं से ओत-प्रोत अच्छी कविता.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कुछ अलग होता है और जब सामंजस्य नहीं हो पता तो अलगाव हो जाता है ..भावपूर्ण रचना

Kailash C Sharma said...

बहुत भावपूर्ण रचना..

anupama's sukrity ! said...

मिलकर भी अकेलेपन का एहसास -
सुंदर प्रस्तुति -

कुश्वंश said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना,अकेलेपन की सुंदर प्रस्तुति

जयकृष्ण राय तुषार said...

rachanaji ek sundar kavita ke srijan ke liye aapko meri badhai aur shubhkamnayen

Rachana said...

@ मनोज कुमार: अशुद्धियां बताने के लिए धन्यवाद. सभी दूर कर दी गई है!

@ Kunwar Kusumesh,संगीता स्वरुप ( गीत ), Kailash C Sharma, anupama's sukrity !, कुश्वंश, जयकृष्ण राय तुषार - आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! आपके शब्द मेरा उत्साह बढ़ाते है!

Himanshu said...

Good one..

Aryan said...

Kashh mere pass bhii kuchh Nice words hotee too Sayy " I really Like it "

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