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Wednesday, May 25, 2011

बहुत दूर छोड़ आई हूँ !




बहुत दूर छोड़ आई हूँ
अनमने मन की विवशता
शब्दो की सरलता
पुकारती मुझे
स्याही की पवित्रता
प्रवाह भरी
भावना की सबलता
उंगलियों में बसी
उलझाती मुझे
लौटा लाती है
वही से
जहाँ छोड़ आई हूँ मैं
अपने जीवन की नीरसता
संग ले आई
एक मीठी सी कविता!

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2 comments:

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर..

कुश्वंश said...

अभिव्यक्तियों का सरल चित्रण बधाई

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