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Saturday, April 3, 2010

ज़िन्दगी!



1. ज़िन्दगी, एहसास है

यादों का
बातों का
वादों का
घातों का
किताबो का
मुलाकातों का
बूंदों का
घरोंदो का
सुगंधों का
भावनाओ का
चाय के प्यालो का
पूजा की माला का

ज़िन्दगी, एहसास है!

2. ज़िन्दगी

बदलता मौसम है
गर्मी के बाद बरसात
बरसात के बाद सर्दी
सर्दी के बाद पतझर
पतझर के बाद गर्मी!

सिलसिला ख़त्म कहाँ होता है!
इस सबके बीच ही
मुस्कुराहते दौड़ती रहती है!

कवियों का अनोखा संसार



कवियों को नक्कारा मत समझो
इनको तुम बेसहारा न समझो

ये वो है जो पत्थर पर फूल खिला दे
ये वो है जो पल में शिला उड़ा दे
ये तो आसमान में मोती उगा दे
ये तो धरती पर सोना बरसा दे!

शब्दों से इनका गहरा नाता है
हाँ, जीवन व्यापन के लिए थोडा मिल जाता है
पर पक्का इनका इरादा है
और बात है, इनका भ्रम थोडा ज्यादा है!

शब्दों के ये जाल बिछाए
बाद में उसमे ही फस जाए
अपने ही मन की बीन बजाये
बाद में उसकी सजा भी पाए!

जो भी है, कवि तो शान से जीते है
कवि है, काल्पनिक कविता कहते है
ये संवाददाता है वहां के
जो अनजान है इस जहाँ से!

बिसराई काजल की कोर!




काजल की कोर
लगाईं नार कोय
अँधेरा घनघोर
बाहर मचा शोर
आंसू भर रोय
ज्योत बुझी हुई भोर
सन्नाटा चऊ ओर
अब क्या आँखें सोय
सूख गयी काजल की कोर!

Sapno ki Andheri Raat! (सपनो की अँधेरी रात!)



काली, अँधेरी सोई रात
सपनो में थी खोई रात

पहाड़ो पर घूम रहे बादल
की मूसलाधार बरसात
जिसमे डूब गए
हमारे दिन और रात!

धरती में हुई शरारत
भूकंप आया लगा घात
उजड़ गया जहाँ
खो गयी सारी बात!

घुप्प अँधेरे की चीखे
पूछे क्या तेरी है जात
बुझ गया अस्तित्व
थामे किसका हाथ!

काली अँधेरी रात
सपनो से सजी रात
हाय, हो गयी नींद बर्बाद!



Sapno ki Andheri Raat!

Kali, andheri, soyi raat
Sapno mein thi khoyi raat

Pahado par ghum rahe badal
Ki musladaar barsaat
Jisme dub gaye
Hamare din aur raat

Dharti mein hue shararat
Bookamp aaya laga ghaat
Ujadh gaya jahan
Kho gayi saari baat

Ghupp andhere ki chikhe
Pochhe kya teri hai jaat
Bujh gaya astitva
Thame kiska haath!

Khali andheri raat
Sapno se saji raat
Hai, ho gayi neend barbaad!


Friday, April 2, 2010

Purana Kamra (पुराना कमरा!)



अलसा सा गया है कमरा
कुछ बुड्ढा और नीरस सा
गहरी चुप्पी बैठी है
मेज़, कुर्सियों और दीवारों पर!

नज़रे उठा के मैं
शेल्फ को देखती हू
सलीके से सजी है
पुस्तके ज़माने की!

प्रेमचंद की कथाओ का संकलन
उसके ठीक नीचे है राजनितिक आंकलन
उसके पीछे कवि का आन्दोलन
वही पास ही रखी है कथा समंदर!

वही पास रखे फूलदान में
कुछ मुरझाये से फूल आज भी
ठीक वैसे ही सजे है
जैसे बरसो पहले महक रहे थे!

थोडा आगे जो मेज़ रखी है
उस पर चाय के प्याले
आज भी ना ख़तम होते
बातों के सिलसिले के गवाह है!

मेज़ के पीछे की दीवार
पर जो श्याम-श्वेत तस्वीर लगी है
उन सुलझे और उन्छुए दिनों
की यादें ताज़ा कराती है!

खिड़की का पर्दा
कमरे में लगे
पंखे की धीमी चाल
से भी मन हिला ही जाता है!

मेरा पुराना कमरा
पुरानी यादों का
संरक्षक है!



Purana Kamra!

Alsa sa gaya hai kamra
Kuch buddha aur niras sa
Gehri chupi baithi hai
Mez, kurshiya aur diwaro par

Nazre utha ke main
Shelf ko dekhti hu
Salike se saji hai
Pustake zamane ki!

Premchand ki kathao ka sankalan
Uske theek neeche hai rajnitik aankalan
Uske peeche kavi ka aandolan
Wahi paas hi rakhi hai katha samandar!
Wahi paas rakhe phooldaan mein
Kuch murjhaye se phool aaj bhi
Theek waise hi saje hai
Jaise barso pehle mehak rahe the!

Thoda aage jo mez rakhi hai
Us par chai ke pyale
Aaj bhi na khatam hote
Baton ke silsile ke gavaah hai!

Mez ke peeche ki diwar
Par jo shyam-shwet tasveer lagi hai
Un suljhe aur unchuye dino
Ki yaadein taaza karati hai!

Khidki ka parda
Kamre mein lage
Pankhe ki dhimi chaal
Se bhi man hila hi jaata hai!

Mera purana karma
Purani yaadein ka
Sanrakshak hai!


Thursday, April 1, 2010

हवा!



हवा
खुशबू में जो घुली
महका गयी सारा चमन!

हवा
बूंदों में मिली
भीगा गयी मेरा मन !

हवा
आंधी ले चली
भेद गयी मेरे नयन!

हवा
धूप में भी खिली
जला गयी मेरा बदन!

हवा
बिजली से भी छली
देहला कर, कर गयी सुन्न!

हवा
फूलो को छू हिली
सजा गयी मेरा रास्ता उपवन!

हवा
पहाड़ो पर चली
बादल बन उड़ सघन!

हवा
चेहरे पर रुकी
आंसू गिरा चली, सजन!

Eershaya Se Daro Nahi! (ईर्ष्या से डरो नहीं!)



ईर्ष्या तुम क्यूँ करते हो
ईर्ष्या से क्यूँ डरते हो

ईर्ष्या तो सांकेतिक है
व्यावहारिक है
बोध कराती है
तुम्हारे प्रगति पथ का

ईर्ष्या से ग्रसित ना रहो
ईर्ष्या से भ्रमित ना रहो

ईर्ष्या को हटाओ
अज्ञानता भगाओ
चिंता घटाओ
संपूर्ण विकास में जुट जाओ!



Eershaya Se Daro Nahi!

eershaya tum kyun karte ho
eershaya se kyun darte ho

eershaya to saanketik hai
Vyavaharik hai
Bodh karati hai
Tumhare pragati path ka

eershaya se grasit na raho
eershaya se bhramit na raho

eershaya ko hatao
Agyaanata bhagao
Chinta ghatao
Sampoorna vikas mein jut jao!