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Tuesday, August 18, 2020

दोबारा से . . .

 सोच सोच के ना भी सोचू

ऐसा कोई दिन नहीं 

साथ छोड़ के मौन बैठें 

क्या तुम वही और मैं भी वही?


चमकती लेखनी की नयी धार

मनचले शब्दों का भरपूर प्रहार

भावनाओं की बहती ब्यार

सच…सुहाने ही तो थे वो पल चार !


समय के भॅवर में रोते हसते 

बूँद बूँद पर जीते मरते 

हमने क्यों मुँह फेर लिया 

जाने किसने किससे बैर लिया !


सोच सोच के ना भी सोचू

ऐसा कोई दिन नहीं 

कुछ कहने का कुछ सुनने का 

मौका यहीं है अभी सही !


Saturday, July 2, 2011

सपने

















सपने
बंद आँखों
में ही सजते है
एक अनजानी दुनिया में
स्वतंत्रता का एहसास दिलाते है

आँखें खुलते ही
सच्चाईया  समझा देती है
अपने उड़ने की सीमा
अपनी धुंधली स्वंतंत्रता!

Saturday, September 25, 2010

Nightmare!



Amidst the darkness of the night, I was running breathlessly, trying to find a shed and overcome my tattered life.

I was battling hard to overcome the juggle between ‘truth’ and ‘falsehood.’ The faster I ran, the nearer it came.

Fear caught and trapped me and I woke up from one of the worst nightmares.



Saturday, June 19, 2010

सपने!




1. संजोये सपने
लगते है अपने
आँख खुले
धुंधला जाए सपने!

2. सपनो का संसार कितना भाता है
पल भर में सरहद पार पहुँचा आता है
ना कोई टिकट, ना कोई पूछ-ताछ
पँख लगा दुनिया घुमाता है!

3. मेरे सपनो के रंग खो रहे है
शायद, काजल की कोर के साथ बह निकले
कल तक तो आँखों में तैर रहे थे
आज आस-पास, कही बिखरे पड़े हो!

4. सपनो का गट्ठर कितना भारी है
मेरी सारी ज़िन्दगी इसको उठाने में ही निकल जायेगी!

5. सुना है, सपने पूरे नहीं होते
बुलबुले के जैसे, आकार ले कर फूट जाते है
मैंने, अपने सपनो को हथेली में उठा रखा है
इस बार, न फूटने दूँगी!