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Monday, November 26, 2012

बाहर तब रात थी !




बाहर तब रात थी 
ऊँघती आँखों से हमने देखा था
सरसराते कानों से क्या कुछ ना सुना था 
कपकपाते गले पर तो ताला ही जड़ा था 
कलेजा हाथो में समेटे कितना सहा था 

बाहर तब रात थी 
समुन्दर  भी सकुचाया था अपने आप में सिमटता
आँसू  बहा रहा था 
कौंधती रौशनी के बवंडर 
इंसानी खून की होली का वक़्त आया था 

बाहर तब रात थी 
सूनी हर आँख थी
अपनों के साथ छूटे 
वारिस और चिराग बुझते 
असहाय, विवस  सब लुटते 

बाहर तब रात थी 
फैलती आग की लपटों के कोहरे 
मौत लायी थी तडके भी सवेरे
मानवता की पुकार 
चीख रही थी हर बार 

बाहर तब रात थी 
उजड़ी हर शाख थी
खून के छीटों से सनी 
गोलिया और धमाको से गूंजती 
कोसती, गुज़रती ना भूलने वाली 
मनहूस वही रात थी!


Friday, July 15, 2011

मुझे लड़ना है तुमसे !

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मुझे लड़ना है तुमसे 
हाँ आज उलझना है तुमसे
कितनो की जाने ली है तुमने 
कितने ही घरो को उजाडा है तुमने

मौन खड़ी अब ना सहूंगी 
आगे बढ़ तुमसे लडूंगी!

जानती हूँ, तैयार नहीं मैं 
मानती हूँ, कमज़ोर नहीं मैं
ढृढ़ निश्चय के साथ 
निरंतर बढ़ूंगी
आँखें मिला सामना करुँगी 
यही खड़ी तुमसे लडूंगी!

तुम हो मौत के सौदागर 
क्या मिला खून-खराबा फैला कर 
क्या मिली शान्ति चिराग बुझा कर?
सवालो के दायरे में 
अब ना घुटूंगी
ज्यादती अब ना सहूंगी
आगे बढ़ तुमसे लडूंगी!

Terroris

Thursday, July 14, 2011

Terror Strikes Again!

Stop Terrorism!