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Tuesday, July 26, 2011

भरा घढा













मैं समुंदर हूँ 
अपने भीतर भरे घढ़े
में भावनाए रूपी मोती 
सहेजती हूँ , सँवारती हूँ
पालती हूँ,  मथती हूँ
कुछ तो उपर झलकने लगते है 
कुछ सतह पर ही 
उलझते रहते है
घढा हमेशा भरा रहता है
जीवन आगे बढ़ता जाता है!

Friday, July 23, 2010

CHANGE!




C lassist approach of growth compels
H ub of knowledge and ability to
A ware ways to escape in a
N ovel reinforement of
G lory that brings stability
E nlarged with broader prosperity spectrum.


बदलाव!!




सुबह से रात तक
रात से सुबह तक
कुछ भी ना रहा कोरा,
वक़्त ने सब कुछ बदल दिया!

कल तक जो रो रहा
जाने, कौन सी बात पर आज हँस पड़ा
कुम्हार की मिटटी ने भी
चोला अपना बदल दिया!

बूंदों जैसी नन्ही कली
फूल बन आज ढल चली
तड़पती धूप भी आज
बिजली की तलवार से छली!

खेतों की कच्ची पगडंडियाँ आज
कारखानों की ऊंची दीवार बनी
खुला वातावरण लगा अब घिरने
सिकुड़ते जा रहे है झरने!

दिलो की दूरियों के ताले
समय की मार से लगे है सड़ने
दोस्ती की उगती झलक
बरसो की गहरी दुश्मनी में मिली!

बदलाव ही अच्छाई और बुराई
जो भर देती है हर खाई
सोचने से करने तक
करने से होने तक
बदलाव ही है अमिट सच्चाई!