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Saturday, March 24, 2012

ख़ामोशी


तुम्हे याद है,
ख़ामोशी मुझे कितनी खलती थी
जिसकी आहट से ही मैं मचल उठती थी

अब देखो
कमबख्त बड़ी तस्सली से
बिखरी पड़ी है
मेरे जीवन में
अधिकार जमा लिया है इसने
मेरी सुबहो पर
ढलती शामो पर

जबसे तुम गए हो ना
हसी भी पास फटकती नहीं मेरे
अगर भूल से नजदीक आ भी गई तो
ये ज़ालिम ख़ामोशी
डंक मार कर उसको
भगा देगी

तंग आ गई हू इससे
जब तुम्हे जाना ही था तो
इसको ले क्यूँ नहीं गए साथ?
खुश तो रहती मैं
ज़िन्दगी तो जी लेती मैं

Tuesday, February 21, 2012

क्या अर्थहीन है?


धर्म और फ़र्ज़ की जंग
तो चिर ज्ञात है

इन सबके लिए भावनाओ को कुचलना
कौन सी नई बात है

हमारा मिलना और बिछड़ना
मात्र संयोग नहीं, मरते जज़्बात है

क्या अपनी ख़ुशी का सोचना
इतनी बुरी बात है?

भूल जाओ, ना रखो याद क्यूंकि
मिलती नहीं अपनी जात है

समय बदला, लोग बदले पर
बदले नहीं अपने हालात है

निभाना है, रिसते, घिसते जाना है
आग उगलती दुनिया में आवाज़ की क्या औकात है

बिखरा मन, ख़ाली आँखें
मोहरे बने इंसान की क्या बिसात है

याद है, उस रात जब आंसू बोल रहे थे
लौट आई आज ऐसी ही रात है

यादों के जंगले घेरे खड़े है
गुज़रे लम्हे की कसक बस साथ है

भुला पाओगे? निकाल सकोगे?
भला प्यार से मीठी कौन बात है?

Tuesday, January 17, 2012

आसमान छूटने को है


जो चुभता है तुम्हे वो
मेरी बातों के बाण नहीं
बल्कि ना पूछे गए सवालो की टीस है

जो रुलाती है तुम्हे वो
मेरे आंसूओ की धार नहीं
बल्कि आने वाले कल की धुंधली परछाई है

जो सताती है तुम्हे वो
मेरे अनगिनत उलझे सवाल नहीं
बल्कि दम तोडती भावनाए है

जो भरमाता है तुम्हे वो
मेरा पागलपन नहीं
बल्कि तुम्हारी अपनी कमजोरी है

सिलवटे लेती ज़िन्दगी
कसमसाने लगी है
कहते थे जिसे अपना
आज वो आसमान
छूटने को है

Monday, September 26, 2011

हम


याद नहीं

कब
कैसे
कहाँ

मैं और तुम
बन गए हम

कहते रहे
सुनते गए
सोचे बिना
चलते रहे
जुड़ते चले
फलते बढे

लगता है ऐसे ही
उलझ गए मैं और तुम

Thursday, July 7, 2011

इंतज़ार

 












सुबह तुम जाते हो 
शाम को लौट आते हो
बीच में रहता है  इंतज़ार

अदभुत् अनोखा  इंतज़ार
इंतज़ार  आस  का
तुम्हारे आभास का
हमारे साथ का
अपने विश्वास का

अच्छा लगता है  इंतज़ार
हमेशा करुँगी
ऐसे ही इंतज़ार !


Sunday, June 19, 2011

To Papa With Love!

Wednesday, June 15, 2011

Love Imprints!

Friday, June 10, 2011

बिखर जाने दो!




बिखर जाने दो
टूट जाने दो
मुझे तुम

कहो ना
साथ हो मेरे
सच्चे सारे
ख्वाब है मेरे

आखिर कब तक
संभालोगे?
मौन रह कर
आज पिघल जाने दो

घाव बड़े
दिखने लगे है
सहलाओ ना
आज फूट जाने दो

पता है
थामे हाथ तुम्हारा
संवर जाउंगी
जीना सीख जाउंगी
शायद
इतनी ख़ुशी झेल ना पाऊँगी
आज साथ छूट जाने दो

बिखर जाने दो
टूट जाने दो
खो जाने दो
आज मुझे तुम!

Tuesday, May 31, 2011

तुम्हारा प्यार




तुम्हारा प्यार
मेरे अन्दर
गहरा रच बस गया है

कभी आँखों से
कभी बातों से
कभी जज्बातों से
उमड़ उमड़ कर
दिख जाता है!

हाँ, बड़ा सताता है
छुपाये ना छुप पाता है
कहू तो कहा ना जाता है
ना कहू तो कहा जाता है

उधमी बड़ा
समझता नही
नटखट बड़ा
सोचता नहीं

लगता है, तुम्हारी तरह जिद्दी हो गया है!

Tuesday, December 21, 2010

जादू की हँसी!




चूरा लो खुशबू फूलो की
छुपा लो गहराई बादल की
समेट लो तरुनाई धरती की
आँखें मूंद लो धरा की सच्चाई
बूझा डालो गर्मी अग्नि की
मुह फेर लो रौशनी हुए जो उजालो से
पर लौटा दो
जादू से घुली तुम्हारी हँसी
जिसकी महक बसी
मेरी यादों में
और साँसों में!

Monday, December 20, 2010

A Love Story!




Met accidentally, spoke rudely, behaved badly, hated most importantly, fought with spirited high, laughed carelessly, made fun extremely, thought profoundly, listened carefully, spoke openly, trusted blindly, waited eagerly, touched internally, hands folded with firm closeness, eyes on you I rejoice and become a shy. Truly, madly, deeply, why I loved you? Dear mice!

Monday, November 22, 2010

अबकी बार...!



अबकी बार आओ तो
बातों में हसी नहीं
आँखों में चमक लाना तुम
जिसकी रौशनी में
अपने आप को पहचान सकू!

अबकी बार आओ तो
माथे पर बल नहीं
मुश्किलों का हल लाना तुम
जिसके सहारे मैं
अपना आसमान छू सकू!

अबकी बार आओ तो
आँखों की नमी छुपाना ना तुम
कोरे, धुले मन में
शायद कही मैं
अपना नाम ढूंढ़ सकू!

अबकी बार आओ तो
मीठी यादों के साथ-साथ
खट्टी झलकिया भी लाना तुम
इस घुली-मिली चासनी में
मैं खुद को भीगो सकू!

जो अबकी बार आना तुम
सब बदल देना तुम…!

Wednesday, October 20, 2010

एक दिन…!




तुम और मैं
खड़े मीलों पार
बीच है ना नाव और पतवार
अब कैसे कहे मन की बात
जानते है यह दोनों हमें है प्यार!

एक दिन…!

सच है, हमारे धर्म है अलग
फिर भी आँखों में है अपनी
प्यार की गहरी झलक
क्यूँ नाम तुम्हारा सुनके
चेहरा मेरा जाता चहक!

एक दिन….!

क्या वो दिन आएगा?
जब हम कर सकेंगे
एक दूसरे से वही बात
जब टूट जाएगी
बीच में खड़ी हर दीवार!

एक दिन….!

तुम तुम रहोगे
मैं मैं रहूंगी
समुन्दर पार
समेटे सपने सजे खुली आँख
बन जाएगी बिगडती सब बात!

एक दिन…!

जब तुम कह सकोगे मुझसे
की तुमसे है मुझे प्यार
बिना जिझक और डर
ऊचे पेड़ पर बनायेंगे
बसेरा अपना जहाँ खुशिया खड़ी द्वार!

एक दिन…शायद ऐसा होगा…हाँ, सब अच्चा होगा!

Tuesday, October 19, 2010

तीन त्रिवेणी- 10




1. झुंझलाते, लड़ते जो तुमने कहा था
आधी कच्ची नींद में जो मैंने सुना था

बात शायद अब तक अधूरी है?

2. हर आहट पर
मुड कर मैंने पीछे देखा

हसी तुम्हारी अब तक गुदगुदा रही है!

3. सूरज फीका लगता है
चाँद भी ठंडा लगता है

तुम्हारे हाथों की गर्मी में पूरी तरह से पिघल गई हूँ!

Monday, October 18, 2010

तीन त्रिवेणी- 9




1. सोचती हूँ! जब तुम नहीं मिले थे
फूलो के रंग खिले नहीं थे

क्या तुम बहार साथ लाये हो?

2. खाली मन, खाली आँखें
देख रही थी टूटा सपना

अच्छा, तुमने रंगों को आँखों में छुपाया था?

3. तुम्हारा और मेरा फासला गहराता है
मन मेरा उसमे डूबता जाता है

आओ, समुन्दर में ही घर बना ले!