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Monday, September 5, 2011

ऊँचाई


समझ नहीं आता ऊँचाई का चक्कर
आखिर मिलना यही है मिटटी में जा कर
जन्म से ही सब ऊँचाई को तरसे

ऊँचाई
कितना लुभाती है
बाद में बहुत सताती है

कितनी ऊँचाई ?
जहाँ तुम दूसरों को देख ना सको
जहाँ तुम खुद को पहचान ना सको
जहाँ तुम छोटी-छोटी खुशियों को तरसो
जहाँ तुम संतुष्ठी को तुम खोजो

मुझे नहीं ऊंचा उठना उतना
जहाँ टूटने लगे संजोया सपना
छूटने लगे हर अपना
ऐसी ऊँचाई व्यर्थ है ना?


Friday, June 11, 2010

कोशिशे!




हाँ, मैंने की है!
तुम भी कर के देखो
बड़े-बड़ो ने की है
कभी तो मिलेगी
सफलता, क्यूंकि
सुना है, कोशिशे कभी बेकार नहीं जाती!