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Monday, September 13, 2010

बरखा!




छलनी-छलनी हो गया आकाश मेरा
सपनो की धारा भी बह चली
बंद आँखें भी उफनती जा रही है
लगता है
मेरे मन के सूने आँगन में
आज झम-झम बरखा नाच रही है!

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